दोनों जहाँ तेरी मोहब्बत में हार के

दोनों   जहाँ   तेरी   मोहब्बत   में     हार    के
वह  जा  रहा  है   कोई   शबे-ग़म   गुज़ार  के

विराँ  है  मयकदा  ख़म-ओ-सागर  उदास  हैं
तुम   क्या  गए  के  रूठ  गए  दिन  बहार  के

एक फुर्सत-ए-गुनाह मिली वह भी चार दिन
देखे    हैं   हमने   हौसले    परवरदिगार   .
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मेरे ख़ुदा मुझे इतना तो मोतबर कर दे

मेरे   ख़ुदा   मुझे    इतना  तो   मोतबर   कर  दे
मैं  जिस  मकान  में रहता हूँ उसको घर   कर दे

यह  रोशनी के  तआकुब  मे भागता  हुआ दिन
जो थक गया है तो अब इस को मुख्तसर कर दे

मैं  जिन्दगी  कि   दुआ  माँगने   लगा  हूँ  बहुत
जो  हो.
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सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

सितारों   से   आगे   जहाँ   और   भी   हैं
अभी  इश्क़  मे   इम्तिहाँ   और    भी  हैं

तही  ज़िंदगी  से    नहीं    यह     फ़ज़ायें
यहाँ    सेकड़ों    कारवाँ   और     भी    है

कनाअत न कर आलम-ए-रंग-ओ बू पर
चमन   और भी  आशियाँ  और  भी   हैं

तू  शाहीं.
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दुनिया के सितम याद न अपनी वफ़ा याद

दुनिया के सितम याद  न   अपनी   ही   वफ़ा    याद
अब मुझको नही  कुछ  भी  मोहब्बत के सिवा  याद

छेड़ा   था    जिसे     पहले    पहल    तेरी    नज़र  ने
अबतक है  वह  एक  नग़न-ए-बेसाज़-ओ-सदा याद

क्या    लुत्फ   कि    मैं    अपना  पता   आप   बताऊँ
कीजिये  कोई  भूल  हुई   ख़ास  अपनी   अदा   याद

जब   कोई    हसीं    होता   है    सरगर्म-ए-नवाज़िश
उस  वक़्त.
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लोग जिक्र करते है तेरा मेरी गजलो में

लोग जिक्र करते है तेरा मेरी गजलो में
मेरा ख्याल ही नही अता तुजे तेरे ख्यालो में

एक हुजूम खड़ी है मेरे पीछे गुलाबो की तरह
एक तू ही नजर नही आता उन कतारों में

पूछते है लोग मुजसे तुम्हारे अपने बारे में
जिक्र करता नही हु जो.
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